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5 Dec 2016 · 1 min read

दरवाज़े पर आवाज़ें

कविता
दरवाज़े पर आवाज़ें

*अनिल शूर आज़ाद

दरवाज़े पर
आवाज़ सुनकर
कोई है/यह सोचते
दरवाज़े तक
जाकर देखा-
कोई नही था

मगर..
बिना किसी के आए
दरवाज़े पर आवाज़ें

अब भी
आती हैं!

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