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3 Dec 2016 · 1 min read

अज़नबी मैं

कविता
अज़नबी मैं

*अनिल शूर आज़ाद

गांव के
जोहड़ में
कागज की/कश्तियां छोड़ने
और फिर/यहां शहर आकर
इश्क की शायरी लिखना
शुरू करने से लेकर

आटे-नून- तेल के
भाव याद होने की
अवस्था के पश्चात्

जब-जब
हिसाब करने/बैठा हूं
अतीत की/कितनी ही यादें
सवालिया निशान बनकर
मुंह चिढ़ाने लगी हैं

कई बार तो/निहायत
अज़नबी सा/लगता हूं
खुद को ही मैं!

(रचनाकाल : वर्ष 1987)

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