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3 Dec 2016 · 1 min read

तुम्हारे नाम

कविता
तुम्हारे नाम

*अनिल शूर आज़ाद

मेरा एकाकीपन
मुझे कचोटता नही है
चांद भी तो अकेला है
(इतने तारे साथ हैं
गलत तर्क है यह !)

दरअसल
लाखों की/भीड़ के बीच भी
कोई एक शख़्स
एक ही/होता है

हां..यह अहसास
कचोटता है/कि
तम्हारे लिए मैं/उपयोगी नही
इसी अहसास को
पोंछने के लिए ही
कुछ ये..कविताएं
तुम्हारे नाम/की हैं
(कविताएं ही मेरा सर्वस्व हैं )

शायद तुम्हें/कुछ
शीतलता दे सकें!

(रचनाकाल : वर्ष 1986)

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