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2 Dec 2016 · 1 min read

बहुत दूर

कविता
बहुत दूर

*अनिल शूर आज़ाद

कल
जब/खूब बारिश
होकर चुकी थी
तब मैं
फिर तुम्हारी
गली मेँ/आया था

सोचा था/मौसम की
खूबसूरती को/देखने
तुम जरूर
अपनी/खिड़की पर
आई होओगी
पर तुम
नही आई

तब/याद आया
पराई होकर
इस घर से तो/तुम
विदा हो/ चुकी हो

और
मुझसे भी तो
चली गई हो
बहुत दूर…

(रचनाकाल : वर्ष 1987)

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