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2 Dec 2016 · 1 min read

बुतों का शहर

कविता
बुतों का शहर

*अनिल शूर आज़ाद

हर तरह
और/हर रंग के
बुतों का/एक विशाल
अजायबघर है/यह शहर

हर
अच्छी एवं बुरी/घटना के
राजदार हैं/यहां बुत

पर..
बुत आखिर
एक बुत ही
होता है

इसलिए/प्रायः
चुप ही/रहते हैं
यहां लोग।

(रचनाकाल : वर्ष 1986)

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