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29 Nov 2016 · 1 min read

रंग बहारों के उतर क्यूँ जाते

रंग बहारों के उतर क्यूँ जाते
ख़ुश्बू के तेरी असर क्यूँ जाते

शाख-ए-मोहब्बत जो रहती हरी
पत्तों की तरहा बिखर क्यूँ जाते

गर होते आज भी साथ मिरे तुम
खुशियों के लम्हे गुज़र क्यूँ जाते

लग जाता अगर यहीं कारख़ाना
छोड़ अपना गांव शहर क्यूँ जाते

क़ाबू में रखते ज़ुबाँ गर अपनी
नज़रों से उनकी उतर क्यूँ जाते

होता गर इरादा -ए- दगाबाज़ी
लूटा के चमन को मगर क्यूँ जाते

इंतज़ार तेरा ‘सरु’ गर न होता
इस मोड़ पे हम ठहर क्यूँ जाते

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