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29 Nov 2016 · 1 min read

हर गली हर कूचे में बाग़बान मिल जाये

हर गली हर कूचे में बाग़बान मिल जाये
गर इंसान के भीतर इंसान मिल जाये

उधार ना सही नक़दी दुकान मिल जाये
ज़िंदगी का कहीं तो सामान मिल जाये

काश के उँची मुझको उड़ान मिल जाये
शिकारी को फिर चाहे मचान मिल जाये

इस शहर को गर तू मेहमान मिल जाये
इन सूनी गलियों को मुस्कान मिल जाये

फैलाउं जो पंख आसमान मिल जाये
कोई तुमसा गर मेहरबान मिल जाये

नये शहर में कोई हम ज़बान मिल जाये
टूटा- फूटा ही सही मकान मिल जाये

‘सरु’के बिखरे लफ़्ज़ों को तान मिल जाये
कुछ ख़्वाब ओ कोई अरमान मिल जाये

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