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29 Nov 2016 · 1 min read

परिंदों को आवाज़ लगाने पे रहने दे मुझे

परिंदों को आवाज़ लगाने पे रहने दे मुझे
शज़र की मानिंद रबा ठिकाने पे रहने दे मुझे

नहीं चाहिए कोई आसमान है इलित्जा मेरी यही
तिरी पलकों के शामियाने पे रहने दे मुझे

सिखाया है जो भी ज़ीस्त ने अब करना है वही
मुहब्बत- ओ -ईमान कमाने पे रहने दे मुझे

सिवा उसके ये दुनियां ना जाने ना माने मुझे
खुदा को अपने ए दिल मनाने पे रहने दे मुझे

यही चाहत है या रब मैं जी जाउं कुछ दिन और
किसी की उम्मीद ओ बहाने पे रहने दे मुझे

उजाले मैं भर दूं तेरी राहों में अहल-ए-वतन
बुझे दीये हर ओर जलाने पे रहने दे मुझे

हवाओं की पेशानी पे क्या खूब लिखा है’सरु’
नई मंज़िल नइ राह बताने पे रहने दे मुझे

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