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28 Nov 2016 · 1 min read

पागल जैसा पागल क्यों है

पागल जैसा पागल क्यों है
मन इतना भी चंचल क्यों है

भरा भरा है घर तो पूरा
खाली माँ का आँचल क्यों है

हरियाली है अलसायी सी
थका थका सा जंगल क्यों है

घोर निराशा में डूबी सी
झरने की ये कल कल क्यों है

रोज नई बीमारी आकर
हमें सताती पल पल क्यों है

साँप मरे दो चार कहीं पर
बदहवास ये संदल क्यों है

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