दर्द बनकर तुम मेरी आँखों में आते क्यूँ नहीं
ग़ज़ल,
दर्द बन कर तुम, मेरी आँखों में आते क्यूँ नहीं ,
किसने रोका है तुम्हें , मुझको बताते क्यूँ नहीं।
शाख़ गुल टूटी कहीं , टूटा क़हर बादल गिरे ,
वक़्त ने कब कब निचोड़ा है, सुनाते क्यूँ नहीं ।
शोर बरपा हो रहा, वीरानगी हर सू दिखे ,
इस तरह की हर तबाही को , हटाते क्यूँ नहीं ।
ज़िंदगी लेगी किसी दिन,अश्क़ बारी की ख़बर,
बा- वफ़ा दिलदार को फिर से बुलाते क्यूँ नहीं।
चाहतों के दरमियाँ, होता नहीं मुझको सुकूँ ,
जाम होठों से लगाकर, मुँह चिढ़ाते क्यूँ नहीं।
पास आओ हम करें कुछ गुफ्तगू लहरों के सँग,
“नील”साहिल पर जो आते, मुस्कुराते क्यूँ नहीं।
नीलोफर ख़ान नील रूहानी,,,