Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
4 Dec 2025 · 1 min read

दर्द बनकर तुम मेरी आँखों में आते क्यूँ नहीं

ग़ज़ल,

दर्द बन कर तुम, मेरी आँखों में आते क्यूँ नहीं ,
किसने रोका है तुम्हें , मुझको बताते क्यूँ नहीं।

शाख़ गुल टूटी कहीं , टूटा क़हर बादल गिरे ,
वक़्त ने कब कब निचोड़ा है, सुनाते क्यूँ नहीं ।

शोर बरपा हो रहा, वीरानगी हर सू दिखे ,
इस तरह की हर तबाही को , हटाते क्यूँ नहीं ।

ज़िंदगी लेगी किसी दिन,अश्क़ बारी की ख़बर,
बा- वफ़ा दिलदार को फिर से बुलाते क्यूँ नहीं।

चाहतों के दरमियाँ, होता नहीं मुझको सुकूँ ,
जाम होठों से लगाकर, मुँह चिढ़ाते क्यूँ नहीं।

पास आओ हम करें कुछ गुफ्तगू लहरों के सँग,
“नील”साहिल पर जो आते, मुस्कुराते क्यूँ नहीं।

नीलोफर ख़ान नील रूहानी,,,

Loading...