खिलखिलाती नहीं है
गीतिका
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बिना दोस्त के खिलखिलाती नहीं है।
बिना बात के बीत पाती नहीं है।
अजब फलसफा है यहां जिन्दगी का।
कभी राह खुद से दिखाती नहीं है।
कभी साथ कोई चले दो कदम भी।
हमें याद उसकी भुलाती नहीं है।
चुराती नजर वक्त पर आज दुनिया।
गिरे को कभी भी उठाती नहीं है।
चलन हो गया है बहुत स्वार्थ पूरित।
कभी बात सच्ची सुहाती नहीं है।
सखा भाग्य से है मिले जिन्दगी में।
सही बात जब मेल खाती नहीं है।
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-सुरेन्द्रपाल वैद्य