जाति का चक्रव्यूह
//*प्रेम-हत्या(जाति का चक्रव्यूह)*//
वे जो कहते हैं
“प्यार अमर है,”
शायद वहाँ खड़े नहीं थे
जहाँ
एक लड़का
अपने ही शहर की सड़क पर
अपने भविष्य की तरह
टूटकर गिर गया।
जहाँ
खून,
काली रात में खिले विषैले धतूरे-सा,
एक प्रेम के विरुद्ध
घोषित किया गया
निर्दयी फ़रमान बन चुका था।
नांदेड़ की हवा में
अब भी काँपती है एक आवाज़
क्या जाति इतनी भूखी हो सकती है
कि भविष्य का मांस भी खा जाए?
उसके बचपन का हर रंग
आज उजड़ा पड़ा है।
मैं सोचता हूँ
कैसा लगता होगा
उस लड़की को,
जिसने खुद
अपने प्रेमी की लाश के माथे पर
सिन्दूर जैसा कोई मौन आँसू रखा होगा
मानो विवाह नहीं,
एक वंचित संसार का
अंतिम साक्ष्य हो।
और मैं
इस अँधेरे की जड़ें खोदता हूँ
तो पाता हूँ,
यह सिर्फ हत्या नहीं,
यह उन घरों की दीवारों पर लटका
एक बदसूरत अवशेष है
जहाँ
मानवता का मुंडन करा दिया गया है।
कभी-कभी प्रेम
एक पवित्र साहस होता है
जिसे
दो लोग चुन लेते हैं,
और
एक समाज उसे
ठुकरा देता है।
इतना ठुकराता है
कि मृत्यु को ही
अंततः दूल्हा बनना पड़ता है।
पूछने का मन होता है
इस देश में
आख़िर किसे बचाने के लिए
हम इतनी बेरहमी पालते जा रहे हैं?
जाति?
परिवार?
सम्मान?
या
हमारी वह नींद
जिसमें एक प्रेमी की चीख
कभी पहुँचती ही नहीं?
मैं देखता हूँ
सक्षम का चेहरा
अब किसी भी लड़के का चेहरा हो सकता है,
उसका नाम
किसी भी शहर का नाम।
उसकी मृत्यु
हर उस घर की मृत्यु है
जहाँ प्रेम से
पहले पूछा जाता है
“लड़का कौन जात का है?”
और अंत में,
कविता वहीं टूट जाती है
जहाँ लड़की ने
अपने मरे हुए प्रेमी का हाथ पकड़ कर कहा
“हमारा प्यार जीता…”
परंतु मैं देखता हूँ
प्यार नहीं,
यह कविता है
जो हार गई है।
और उसकी राख में
हम सबके चेहरे काले पड़े हैं।
इस मृत्यु के धुएँ में साफ़ दिखता है
हम एक ऐसे देश में जी रहे हैं
जहाँ जातिप्रथा का चक्रव्यूह
अब भी बच्चों की लाशों पर खड़ा है,
और जहाँ हिंदुत्व की छद्म-धारणा
प्रेम को अपराध बताकर
हिंसा को संस्कृति का नाम दे देती है।
जिस दिन प्रेम को
जाति और धर्म की अदालतों से
मुक्त कर देंगे
उसी दिन
यह देश भी
मानव होने की दिशा में
पहला कदम रखेगा।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’