सतनाम रावटी - रतनपुर
गुरु घासीदास ने अपनी आठवीं रावटी रतनपुर के दुलहरा तालाब के पास पेड़ के नीचे लगाई। वहाँ बड़ी संख्या में लोग आए। गुरुजी ने उन सब को सतोपदेश दिए। फलस्वरुप बहुत लोग सतनाम धर्म अंगीकार कर सतनामी बनने लगे। दिन-प्रति-दिन दीन-दुःखियों, रोगियों और किसी न किसी रूप में पीड़ित-परेशान लोगों की भीड़ बढ़ती चली गई। यह खबर रतनपुर की राजकुमारी रत्ना देवी तक पहुँची। वह सन्त दर्शन के लिए बेचैन हो उठी।
अन्ततः राजकुमारी रत्ना देवी अपनी सहेलियों और दासियों को साथ लेकर गुरु घासीदास के दर्शन के लिए रावटी स्थल पहुँची। वहाँ गुरु घासीदास के प्रदीप्त चेहरे और सुन्दर काया को देखकर राजकुमारी रत्ना देवी मोहित हो गई। गुरु घासीदास सर्व ज्ञानी और मनोवैज्ञानिक थे। वे राजकुमारी के मन में चल रही बात समझ गए। तब गुरु घासीदास ने राजकुमारी के मोह को दूर किया और उन्हें विभिन्न सतोपदेश देकर उनके मन के विकार को दूर किया।
गुरु घासीदास ने राजकुमारी को सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। फिर भी गुरुजी की दिव्य वाणी से प्रभावित होकर राजकुमारी रत्ना देवी ने विनय किया कि – ‘हे दिव्य मानव, मैं आजन्म आपकी सेविका बनना चाहती हूँ। कृपया मुझे स्वीकार कीजिए। मैं मन, वचन और कर्म से आपकी हूँ।’
राजकुमारी की बात सुनकर गुरु घासीदास ने धर्म के अनुसार राजकुमारी को उत्तर दिया – ‘सुनो रुपसी, तुम अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहती हो तो जैतखाम की स्थापना कर अपने जीवन को दीन-दुःखियों की सेवा के लिए समर्पित कर दो। इसी में तुम्हारा कल्याण होगा।’
कहते हैं कि बाबा गुरु घासीदास ने राजकुमारी के लिए दुलहरा तालाब के पार में जैतखाम की स्थापना करवाई थी। गुरु घासीदास की दिव्य वाणी को सुनकर और उसे मानकर राजकुमारी रत्ना देवी महलों का सुख छोड़कर साध्वी का रूप धारण कर ली थी और अपने जीवन को मानव कल्याण के लिए समर्पित कर दी थी। सते हितम् । जय सतनाम ।
मेरी 75 वीं कृति : ‘सतनाम प्रकाश’ से…
डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
साहित्य वाचस्पति
इंटरनेशनल स्टार अवार्ड प्राप्त
हरफनमौला साहित्य लेखक