भूख
भूख
कभी कभी भूख इंसान को खा जाती है।
कभी कभी इंसान भूख को खा जाता है।
अक्सर रात को देखता हूं मैं
चांद सितारे सूरज की तरह चलते हैं
धरती बिछौना है, यह…
दिन में नहीं, रात को पता चलता है।
कोई पन्नी से तन ढकता है
कोई बोरी से तन ढकता है
कोई गत्ते से तन ढकता है।
कुछ न मिले तो..
अपने मन से तन ढकता है।
उसके साथ सोते हैं
कुत्ते, यह जमीन, यह आस्मां
भूखा है आदमी..
जिंदगी का बोझ ढोता है।
बैठता है उकड़ू तो
भूख शांत हो जाती है
लेटता है उकड़ू तो
नींद आ जाती है।
सूर्यकांत