i: ( जंगल से प्यार ) (अंतिम क़िश्त )
i: ( जंगल से प्यार ) (अंतिम क़िश्त )
अब तक– ‘अखिलेश भी उन सबको विदा करने को तैयार हो गया ।
आगे– जाते जाते दुर्गा ने अखिलेश से कहा कि मैं आज वचन देती हूं कि कभी आपको हमसे किसी भी तरह की मदद की ज़रूरत पड़ी तो हम पीछे नहीं हटेंगे। इसके बाद दुर्गा अपने बच्चों को लेकर अखिलेश के घर से जंगल की ओर चल दी ।
समय गुज़रता गया अखिलेश का जंगल जाना बदस्तूर ज़ारी रहा । एक दिन स्कूल से उसकी बहुत जल्दी हो गई तो वह शेरू और शेखू को लेकर जंगल चला गया । वहां लगभग घंटे भर घूमने के बाद उसे जब थकान लगी तो वह शेरू और शेखू को एक पेड़ के नीचे बैठा कर खुद उस पेड़ के उपर चढ गया और पेड़ के मद्ध्य में एक मोटी डाली पर लेटकर आराम करने लगा । थोड़ी देर बाद उसे नींद आ गई । उस वृक्ष की सबसे उपर डाली में चार चिड़ियों का समूह बैठा था । जो आपस में ही बातचीत में व्यस्त थे ।
आधे घंटे बाद अखिलेश को आभास हुआ कि शेरू और शेखू लगातार भूंक रहे हैं । उसने सिर घुमाकर उपर देखा तो उसे अपनी ही डाली के उपरी हिस्से पर एक सांप नज़र आया, जो नीचे उसकी तरफ़ ही आ रहा था ।यह देखकर अखिलेश कुछ डर गया । उसके बाद उसने अपनी आंखें नीचे की ओर फ़ेरी तो उसका डर चार गुना बढ गया । नीचे से भी एक सांप उसकी तरफ़ आ रहा था । इस तरह से उपर और नीचे दोनों तरफ़ जाने का रस्ता बंद हो चुका था । उधर उपरी डाली पर बैठे चिड़िया गण आपस में चर्चा कर रहे थे उनमें से एक ने कहा कि नीचे डगाल पर बैठा वह लड़का तो खतरे में है ।
तभी दुसरे नंबर पर बैठी चिड़िया ने कहा कि ध्यान से देखो उस बच्चे का चेहरा जाना पहचाना नहीं लगता ? और नीचे देखो वे दो कुत्ते जिनकी पनाहों में हम लगभग 20 दिनों तक उस बच्चे के घर में रहे थे । अरे ये बच्चा तो अखिलेश प्रताप सिंग है जिसने हमारी पूजनीया माताश्री को बचाया भी था और हमारी माता ने इस बच्चे को वचन दिया था कि कभी तुम्हें हमारी मदद की ज़रूरत पड़ेगी तो हम ज़रूर करेंगे । क्या तुम तीनों को अपनी माता के वचन और याद नहीं है ? तब बाक़ी तीनों ने कहा कि हां हमें याद आ गया पर सांपों से हम कैसे लड़ें , ये तो हमें आता नहीं । तब पहली वाली उस चिड़िया जिसका नाम था लक्षमण ने कहा कि जंग लड़ने के लिये हौसला सबसे महत्वपूर्ण होता है। फिर यहां जीत हार से ज्यादा महत्वपूर्ण है उस बालक को बचाने का प्रयास करना ।
आखिर वचन दिया क्यूं जाता है ? सिर्फ़ कुछ पलों के लिए वाहवाही लूटने के लिए । सुनो भाइयों हम पूरे चार हैं अगर एक एक सांप के उपर हम दो दो मिलकर हमला करें तो वे दोनों सांप पीछे हटने में मजबूर हो जाएंगे ।
इतना कहते ही लक्षमण अकेले ही जय मां काली, कलकत्ते वाली, तेरा वचन न जाये खाली ,जय मां काली
का उद्घोष करते हुए तेज़ी से नीचे की ओर जाने लगा । नीचे वाली सांप के पास पहुंच कर उसने सबसे पहले अपनी चोंच से सांप के पूंछ पर वार किया । जिससे वह सांप ठिठक गया और पीछे मुड़कर लक्ष्मण के पैरों पर वार किया । सांप के वार से लक्ष्मण का संतुलन बिगड़ गया और वह नीचे गिरने लगा । लेकिन वह जल्द ही संभल गया । उसने अब और ज़ोर व गुस्से से उस सांप की गर्दन पर वार किया । जिससे सांप की गर्दन से खून निकलने लगा । सांप ने भी पलटकर लक्ष्मण के पंखों पर हमला किया । इस वार से लक्ष्मण के पंख उखड़कर अलग हो गए।
उधर राम भरत और शत्रुघन ने देखा कि उनका भाई लक्ष्मण उस बच्चे को बचाने और माता के वचन को निभाने अकेले ही सांप से लड़ रहा है तो उनके मन में ग्लानि पैदा हुई कि हम भी कितने खुदगर्ज़ हैं कि अपने भाई लक्ष्मण को अकेले ही सांप से लड़ने के लिए छोड़ दिए हैं ,और हम तीनों पत्थर की मूर्ति बनकर बैठे हैं । इसके बाद तीनों ने एक दूसरे को इशारा किया और फिर वे तीनों भी हर हर महादेव का उद्घोष करते हुए दोनों सापों के उपर टूट पड़े। दो-तीन चिड़ियों के द्वारा एक साथ अपनी चोंच से किए गए हमले को दोनों सांप झेल नहीं पाए और घायल होकर नीचे गिर गए। जहां शेरू और शेखू ने उन दोनों का मिन्टों में ही काम तमाम कर दिया ।
उधर अकेले लड़ते हुए लक्ष्मण भी बुरी तरह से घायल हो गया था । अखिलेश उन चारों को लेकर अपने घर आ गया। घर आकर उसका पहला काम था कि लक्ष्मण का उपचार करना । लेकिन लक्ष्मण की हालात तीसरे दिन से और बिगड़ने लगी और चौथे दिन सुबह सुबह उसका स्वर्गवास हो गया । इसके बाद अखिलेश ने पूरे विधि विधान से अपने खलिहान के मद्ध्य में लक्ष्मण का अंतिम संस्कार करके उसकी मृत काया को वहीं दफ़नवा दिया । वहीं पर लक्ष्मण के नाम से एक समाधी भी बनवा दी गई। कुछ समय बाद अखिलेश ने लक्ष्मण की समाधी के पास ही एक भव्य मंदिर बनवा दिया । जिसके अंदर लक्षमण भगवान की मूर्ती स्थापित कर दी गई और मंदिर की दीवारों पर चिड़ियों की रेखा चित्र खुदवा दी गई ।
आज सिरपुर में स्थित यह मंदिर, जहां पहले वीर प्रताप और अखिलेश प्रताप की जागीरदारी थी ,समुचे भारत में लक्षमण जी का इकलौता मंदिर है। भारत देश के किसी और स्थान में लक्षमण जी का मंदिर नहीं है । लोग इसे भगवान लक्षमण के लिए बनाया गया मंदिर समझते हैं पर इसके पीछे एक किवदंती भी है कि यह मंदिर लक्ष्मण नाम की चिड़िया की याद व शान में उसकी कुर्बानी को महत्व देने 50 वर्ष पूर्व सिरपुर के ज़मींदार के सुपुत्र अखिलेश प्रताप सिंग द्वारा बनाया गया था।
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