सर्द हवा
गीतिका
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बहुत सर्द सी अब हवा चल रही है।
लिए मौन जब शाम भी ढल रही है।
कभी धूप दिन में बहुत है सुहाती,
मगर है हवा साथ भी खल रही है।
गगन में कभी बदलियां हैं घुमड़ती,
मगर बारिशों की झड़ी टल रही है।
दुबक कर घरों में सभी आ गये जब,
खुले में कहीं आग भी जल रही है।
कठिन हाल में आज का दिन बिताया,
हमेशा यही बात अविरल रही है।
समय पर हमें नित्य अनुभूतियां ही,
बताती हमेशा सही हल रही है।
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-सुरेन्द्रपाल वैद्य