उसने अपने खेत में कविता बो दिया
उसने अपने खेत में
कविता बो दिया
बीज की तरह,
धीमे से,
जैसे धरती से कह रहा हो
ले, इसे भी अंकुरा देना
अगर तेरी मुट्ठी में
अब भी थोड़ी-सी
नम्रता बची हो।
हल की धार
सिर्फ मिट्टी नहीं चीर रही थी,
वह सदियों का
अन्याय उधेड़ रही थी
जागीरों की बाड़,
पानी की मनमानी,
धान की जगह उगते साहूकार।
और वह हँसा
एक थकी,
पर पूरी तरह टूटी नहीं हँसी।
कहा
फ़सल चाहे सूख जाए,
पर कविता नहीं सूखेगी।
यह ककड़ी-लोकी नहीं,
लड़ाई का बीज है।
उसके पैरों में घुबरी थी,
पर आँखों में सुबह का उजाला;
उसकी पत्नी ने सिर हिलाकर पूछा
कविता खाई जाएगी क्या?
वह बोला
जब लोग बोलना भूल जाते हैं,
तभी पेट भूखा मरता है।
यह कविता
हमारी भूख को आवाज़ देगी।
बरसात आई,
और खेत में
पहले हरे पत्ते फूटे
वह चमत्कार नहीं था,
वह उम्मीद थी
जो अकाल में भी
ज़िद से उगती है।
गाँव के बच्चे
उन पत्तों को छूकर पूछते
काका, यह धान है?
वह कहता
धान से भी कीमती है यह।
यह हमारी तरफ़ से
समय को दी गई चुनौती है।
कटाई के मौसम में
लालिमा कुछ ज़्यादा थी
धान की नहीं,
संघर्ष की।
और जब उसने पहली गठरी बाँधी,
तो उसे लगा
मानो अपने ही हाथों
एक नया नारा बटोर रहा हो।
उसने अपने खेत में
कविता बो दिया
अब हवा जब चलती है,
तो गाँव के ऊपर से
किसानों की आवाज़
सरसराहट बनकर गुजरती है।
और यह आवाज़
मौसमों से नहीं डरती
न सूखे से,
न सूद से,
न सत्ता की फसल काटने वालों से
क्योंकि उसे पता है
कविता का खेत
किसी भी साम्राज्य से
ज़्यादा उपजाऊ होता है।
कवि जानता है,
कविता रूपी फसल की
ना बीमा होती है और
ना हीं उसे
किसी प्रकार की सब्सिडी
ही मिला करती है।
फसल के तरह
मौसम के अनुकूल ही
कविता पकती है।
© अमन कुमार होली