प्रेम में पड़ा पुरुष
प्रेम में पड़ा पुरुष
वह अचानक शीशे में
ख़ुद को ज़्यादा देखता है,
बेतरतीब बाल सँवारता है,
और कपड़ों पर सिलवटें
ग़ौर से निहारता है।
एक अजीब-सी आतुरता
बनी रहती है
उसके इंतज़ार में;
घड़ी की हर टिक-टिक
उसे चिढ़ाती है।
प्रेम में पड़ा पुरूष
अचानक बदल जाता है।
वह सहनशील हो जाता है,
वह कवि या शायर हो जाता है
बिना कागज़ और कलम के,
वह बच्चा हो जाता है
एक छोटी-सी तारीफ़ पर।
उसकी जेब में
टिकटों, चाबियों, क्रेडिट कार्ड के बीच
एक अदृश्य फूल छिपा रहता है
जिसकी खुशबू
सिर्फ़ वही जानता है।
दुनिया उसे देखती है
पर नहीं समझती
कि उसके भीतर
बादलों का एक काफ़िला
धीरे-धीरे आकार बदल रहा है
कहीं बारिश,
कहीं बिजलियाँ,
कहीं अचानक फैलती धूप
उसके चेहरे पर खिलती
और मुरझाती है।
प्रेम में पड़ा पुरुष
गहरी रात में भी सुन सकता है
किसी दूर की हँसी
जो सिर्फ़ उसी के लिए जन्मी हो।
वह समझ नहीं पाता
कि यह जादू है
या भ्रम,
पर वह जानता है
कि उसकी बरसों की सूखी ज़मीन पर
कहीं कोई हरियाली उग आई है।
और यही काफी है
कि चौराहे की
भीड़ में खड़े रहते हुए भी
उसकी धड़कनों में
एक गुप्त रास्ता खुल गया है,
जहाँ कदम
उसी की ओर जाते हैं
जिसने उसके भीतर
एक पूरा मौसम बो दिया है।
हां, प्रेम में पड़ा पुरुष
एक चलता-फिरता
मौसम बन जाता है।
© अमन कुमार होली
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय