वह भीड़ में भी अकेला है
वह भीड़ में भी अकेला है
शहर की धड़कनों में खोया
वह आदमी
हर मोड़ पर
अपनी ही परछाईं से टकराता है।
आवाज़ें हैं
बहुत सारी,
पर कोई शब्द
उसके भीतर तक नहीं उतरता।
गाड़ियों की चीख,
बाज़ार का शोर,
मोबाइल और मशीनों की मुनादी
सब कुछ उसके आसपास घूमता है,
जैसे वह एक खाली केन्द्र हो
और दुनिया
अपने-अपने काम में व्यस्त
उसे कहीं भूल गई हो।
लोग उसके पास से गुज़रते हैं
कंधे छूते हैं,
नज़रें टकराती हैं,
पर ठहरती नहीं।
वह हँस भी लेता है कभी-कभी
किसी और के मज़ाक पर,
पर उसकी अपनी मुस्कान
उसके होंठों तक आने से पहले ही
भीड़ के शोर में
खो जाती है।
चलते-चलते
वह महसूस करता है
कि दुनिया एक मेले की तरह है,
रंग, रोशनी, शोर,
और उसके बीच
एक अजीब-सी ख़ामोशी
जो सिर्फ़ वही सुन सकता है।
कितनी अजीब बात है
हज़ारों चेहरों के बीच
धड़धड़ाती ज़िन्दगी के बीच
धकेलती, बहाती, पुकारती भीड़ के बीच
वह भीड़ में भी
अकेला है।
©अमन कुमार होली