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2 Dec 2025 · 3 min read

वे नन्ही अंगुलियां

वे नन्ही अंगुलियां
ये केवल अंगुलियां नहीं हैं।
ये तो प्रथम स्पर्श हैं,
ब्रह्मांड के गूढ़ संकेत को
माँ के आँचल में डिकोड करतीं।
कोई व्याकरण नहीं है इनके पास,
न इन्हें पता है कविता का शिल्प।
फिर भी…

जब ये अनजाने में
पिता की दाढ़ी सहलाती हैं,
या मिट्टी के कण कुरेदती हैं,
एक अप्रत्याशित दर्शन होता है।
जीवन की जड़ता को
एक पल में खंडित करती हैं।
इन्होंने अभी राग-द्वेष को नहीं जाना,
न इन्हें पता है धन का मूल्य।
जब ये शून्य में मुट्ठी बनाती हैं,
मानो ब्रह्मांड का सारा निर्वात
इनके भीतर सिमट गया हो।
एक रहस्य, एक संभावना।
ये आश्चर्य हैं।
हर सुबह जब ये खिलखिलाकर
हवा में लहराती हैं,

वे एक अदृश्य संधि रचती हैं
वर्तमान और भविष्य के बीच।
वे बताती हैं कि सरलता ही अंतिम सत्य है,
शेष सब आडम्बर है।
इन्हीं में छुपी है
महान कलाकारों की
अधूरे कैनवास की कहानी,
इन्हीं में गूँजता है

प्रथम बार हाथ थामने का संगीत।
ये अंगुलियां हैं।
नन्ही ज़रूर, पर इतनी विशाल
कि दुनिया के सबसे बड़े सच को
एक बार में समेट लेती हैं।
और जब ये अंगुलियां
हमारे चेहरों को छूती हैं,
ये पूछती हैं एक अनकहा सवाल
हम इतने जटिल क्यों हो गए?

क्यों इतने बोझ ढो रहे हैं
जो हवा से भी हल्के थे?
इन नन्ही उंगलियों में
किसी प्राचीन ऋषि का मौन है,
किसी नूतन बीज का संकल्प।
वे हर रोज़ देखती हैं
हमारा भागना, हमारा गिरना,
हमारी छोटी-छोटी फ़िक्रें।

वे साक्षी हैं
उस मासूमियत की
जिसे हमने कहीं पीछे छोड़ दिया।
वे पुकारती हैं उस भूली हुई धुन को
जो हमारे भीतर कभी बजती थी।
जब वे पेंसिल पकड़ती हैं पहली बार,
टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें खींचती हैं
वह सिर्फ़ कागज़ पर खिंचाव नहीं है;
वह पहला आविष्कार है।
वह पहला विद्रोह है

उस व्यवस्थित दुनिया के ख़िलाफ़
जिसे हमने नियमों से जकड़ दिया।
हर नई पकड़ी हुई वस्तु
खिलौना, रोटी का टुकड़ा, या बस हवा
उनके लिए पहला अनुभव है,
हर बार एक नई सृष्टि।

ये उंगलियां उस धागे की तरह हैं
जो वर्तमान को भविष्य से कसकर बाँधता है।
वे हमें याद दिलाती हैं
प्रेम ही वह एकमात्र मुद्रा है
जो समय के पार चलती है,
और सरलता ही वह सबसे बड़ी दौलत है
जिसे दुनिया की कोई तिजोरी नहीं माप सकती।
वे आशा का व्याकरण हैं
नन्ही, पर अनंत।
हर स्पर्श में एक नया जीवन
रचती हैं।

जब हम थक जाते हैं,
और दुनिया की भीड़ हमें निराशा देती है,
हम अचानक उस पुराने फोटो पर रुकते हैं
जहाँ हमारी अंगुलियाँ भी कभी
इतनी ही नन्ही थीं।
वह पहचान है हमारी।
वह मूल स्रोत है, जिससे हम भटके।
ये नन्ही अंगुलियां,
जिन्होंने हवा को मुट्ठी में भरने की ज़िद की,
जिन्होंने सूरज की रोशनी को छूने की चाह रखी,

वे हमें सिखाती हैं कि
असंभव जैसी कोई शब्दावली
इस शुद्ध शब्दकोश में नहीं है।
ये केवल स्पर्श नहीं हैं,
ये प्रार्थना हैं
सबसे सरल, सबसे शक्तिशाली।
जब ये माथे पर हाथ रखती हैं,
बीमार माँ या पिता के
तब कोई भी डॉक्टरी पर्चा या दवा
उस जादुई ऊष्मा को नहीं पा सकती।
इनकी निर्दोष शक्ति
हमें फिर से जीवित करती है।
ये अंगुलियां हैं…

जो कभी नहीं मरतीं।
वे पीढ़ी दर पीढ़ी यात्रा करती हैं,
हर शिशु के जन्म के साथ
फिर से जागृत होती हैं।
ये मानवता की अखंडता का प्रमाण हैं,
कि निर्मलता कभी समाप्त नहीं होती।
हम बस इसे ढूँढना भूल जाते हैं,
और फिर ये नन्ही उंगलियां
हमें घर का रास्ता दिखाती हैं,
ये हैं सरलता का शाश्वत सत्य।

© अमन कुमार होली

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