ज़माना ही गया देखे
ग़ज़ल
ज़माना हो गया देखे ,ये अब हिचकी सताती है ,
कहाँ खोये हो आ जाओ ,तुम्हारी याद आती है ।
तुम्हारे ही खयालों में ,मुझे उलझन रुलाती है ,
कभी चन्दा बुलाता है ,कभी शबनम रिझाती है।
बरसता देखती सावन,तो जलती हूं अगन जैसी,
तुम्हारी याद जो मुझको , हँसाती है ,रुलाती है।
तरस आता नहीं बिलकुल ,तेरी गोरी पे अब प्रीतम ,
जिया जल जल के कहता है,तु खुद को क्यूं सजाती है ।
मैं उलझा काम में गोरी , तुम्हें बतला नहीं पाता,
परेशां खुद को मत करना, मुझे क्यूं दिन गिनाती है ।
उदासी भूल जा अपनी , मैं जल्दी आने वाला हूं,
कहां भूला हूं मैं तुझको ,अभी क्यूं दिल बुझाती है ।
परी तू मुझको लगती है ,सुनहरे बाल वाली तू,
मुझे सोने नहीं देती ,तु आ आ कर ,जगाती है।
बराबर बोल के तुम भी, सनम जल्दी नहीं आते ,
कसक उठती है दिल से यूं , लगे खंजर चुभाती है ।
सुकूं खोया तुम्हारे बिन, कहूं किस्से बता दो अब ,
चला आ मेरे परवाने ,शमां घुलती ही जाती है ।
मेरी जानाँ मैं आया हूं , ज़रा पट खोल दो घर के ,
मुझे अब देख दांतों उंगली , क्यूं कर दबाती है ।
मेरी बाहों में आजा अब ,बरस जा चांदनी जैसी ,
कहां रक्खीं मेरी यादें , बता दे क्यूं छिपाती है ।
उधर देखो वो तस्वीरों में कुंदन सी नज़र आए ,
वही तो “नील” है ख्वाबों में जो,गजलें सुनाती है।
✍️ नीलोफर खान नील रूहानी