जंगल से प्यार' [ कहानी _प्रथम क़िशत }
जंगल से प्यार’ [ कहानी _प्रथम क़िशत }
अखिलेश प्रताप सिंग की उम्र महज 8 वर्ष रही होगी । वह जमींदार वीर प्रताप का अकेला पुत्र था । उसे जंगल में घूमना , नाना प्रकार के पक्षियों को देखना , तितलियों को पकड़ना अच्छा लगता था
। उसके ही गांव से लगा हुआ एक छोटा सा जंगल था । अखिलेश जब भी जंगल जाता अपने प्यारे व शेर जैसे दिखन वाले कुत्तों को , जिनका नाम शेरू और शेखू था, अपने साथ ज़रुर ले जाता था । शेरू और शेखू के साथ रहने से उसे अपनी सुरक्षा की चिन्ता नहीं रहती थी ।
गर्मी के दिन थे अखिलेश शेरू और शेखू को लेकर जंगल की ओर चल पड़ा, जंगल में प्रवेश करने के कुछ देर बाद ही उसे एक गौरैया चिड़िया ज़मीन पर तढफ़ती मिली । उसका शरीर काला पड़ चुका था , पंख जल गए थे और लगता था कि उसकी एक टांग भी टूट गई है । वह संभवत: वहां से जा रही हाई टेन्शन लाइन की चपेट में आकर चोटिल हो गई थी व ज़मीन पर गिरकर ज़िन्दगी की जंग लड़ रही थी । अखिलेश चिड़िया को अपने हाथ में उठाकर अपने घर की ओर जाने लगा तो चिड़िया बेचैन हो गई । ऐसा लगा कि उसे यह मन्ज़ूर नहीं । अखिलेश को एक बारगी समझ नहीं आया कि उसे क्या समस्या है ?वह चिड़िया की ओर देखते रहा तो उसे पता चला कि चिड़िया बार बार अपनी गर्दन उठाकर दाएं बाजू वाले एक पेड़ की उपरी डालियों को देख रही है । तब अखिलेश ने ध्यान से उन डालियों की ओर देखना प्रारंभ किया तो उसे कुछ देर बार उसे चिड़िया के छोटे छोटे बच्चे दिखे तो नीचे से चार की संख्या में नज़र आए। अब अखलेश समझ गया कि वे चारों जो उपर डाली में बैठे हैं , इसी चिड़िया के नवजात बच्चे हैं। अखिलेश तुरंत ही अपनी थैली को खाली करके उपर पेड़ पर चढा और चारों बच्चों को थैली में हौले से रखकर नीचे उतर आया । नीचे उतरकर उसने घायल चिड़िया को भी उस थैली में आहिस्ता से रख दिया ।फिर उन पांचों को लेकर अखिलेश अपने घर पहुंच गया । साथ में शेरू और शेखू भी घर आ गए।
घर पहुंचते ही अखिलेश ने अपने पिता वीर प्रताप से कहकर एक छोटा सा जालीदार दड़बा बनवा लिया । उस दड़बे में अच्छे से घांस फूंस बिछाकर उन पांचों पंक्षियों को दड़बे के भीतर सुरक्षित तरीके से रख दिया । उसके बाद उसने घायल चिड़िया, जिसका नाम उसने “दुर्गा” रख दिया था , उसे अपने हथेली पर उठाकर उसके घाव को धीरे धीरे एन्टीसेप्टिक सालुशन से साफ़ करके वहां मलहम लगा दिया । उसके टूटे पैर को बांस के एक छोटे से कमचिल से सहारा देकर उस पर एक आयुर्वेदिक तेल लगा दिया । अखिलेश ने उस दड़बे के एक किनारे पर पीने का पानी कटोरी में रख दिया और दूसरे किनारों पर बहुत सारे चांवल के दाने बिखेर दिए , ताकि उन पांचों में से किसी को भी भूख प्यास लगे तो दड़बे के अंदर ही उनकी समस्या का हल हो जाए । शुरुवात के तीन दिनों तक तो दुर्गा की तबीयत में कोई सुधार नहीं दिखा । वह सुस्त सी दड़बे में उसी तरह से पड़ी रही जैसा वह पहले दिन पड़ी थी । लेकिन तीसरे दिन से दुर्गा चहचहाने लगी और अपने एक पैर के सहारे लरखड़ाती हुई चार कदम चलने भी लगी ।
अगले 20 दिनों में चार बच्चों की माता दुर्गा पूरी तरह स्वस्थ्य हो गई और उसके बच्चे भी उड़ने के लायक हो गए । अब लग रहा था कि दुर्गा अपने बच्चों को लेकर वहां से अपने जंगल वाले इलाके में जाना चाह रही है ।
अखिलेश भी उन सबको विदा करने को तैयार हो गया ।
( क्रमशः अगले अंक में अंतिम क़िश्त )