★ ममता का सागर ★
★ ममता का सागर ★
मां के बल से झुके आसमा,
ममता का सागर है मां।
अवगुण जिसके पास न भटके,
सद्गुण की गागर है मां।।
करुणा पुंज दया की मूरत,
दर्द पीर की नागर है मां।
भाग्य लिखे निज हाथों से,
संतानों की आगर है मां।।
ओट से रोटी तक लाती,
सारा पाठ पढ़ाती है मां।
शून्य से शिखर ले जाती,
समता भाव सिखाती है मां।।
बुरी नज़र से जिसे बचती,
लोरी रोज सुनाती है मां।
जीव जगत में देवी के सम,
सबके मन को भाती है मां।।
चले आंधियां दुर्दिन वाली,
शीतल पानी पोखर है मां।
जीवन सफल बनाने वाली,
सफल कहानी आखर है मां।।
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कवि:- गजानंद डिगोनिया ‘जिज्ञासु’