''गलत पे जो चुप रहते हैं,''
”गलत पे जो चुप रहते हैं,”
गलत पे जो चुप रहते हैं,
वे खुद को ही छलते हैं।
श्यामल को काला कहने वाले,
ज्ञान कहाँ से फलते हैं?
कर्तव्य भूल, उपदेश सुनाएँ,
ऐसे लोग क्या पायें।
गंगा में बस हाथ भिगोना,
गहराई में उतर न पायें।
दुर्बलता जिनका है सहारा,
वे औरों का क्या थामेंगे?
साहस से जो भाग निकलें,
वे इतिहास कहाँ नामेंगे?
मूक बने जो सब सहते हैं,
वो धीरे-धीरे ढहते हैं।
धरती पर बोझा बनकर,
बस जीते हैं, यूँ रहते हैं।
सुनील बनारसी