समय का फेर
समय बचपन, जवानी या बुढ़ापा ले के आता है
न जाने क्यों समय हमको बनाकर फिर मिटाता है
कभी अपने हुनर पर तुम ग़ुमाँ करना नहीं इंसाँ
बनाता है तू दीपक तो समय सूरज बनाता है
कोई गुमनाम हो, मशहूर हो, कंगाल या राजा
समय हो जाए गर पूरा तो बचकर कौन जाता है
अगर तस्वीर बचपन की दिखाई जाए तो अक्सर
नहीं ख़ुद को भी बूढ़ा आदमी पहचान पाता है
बुरा हो गर समय अपना नहीं पहचानते हैं लोग
समय गर साथ दे तो ये जहाँ सिर पे बिठाता है
समय का साथ मत छोड़ो भले मुश्किल सफर आये
समय की यह भी खूबी है, गिराये तो उठाता है
समय के फेर से धीरज कभी खोना नहीं ‘आकाश’
बहारें हों कि पतझड़ हों समय सबकुछ दिखाता है
– आकाश महेशपुरी
दिनांक- 26/11/2025