कविता: 'राह'
कविता: ‘राह’
✍️ सुनील बनारसी
हर वैभव से लज्जित क्यों हो,
वैभव भी तो श्रम का फल है।
पसीने से सींची धरती,
हर खुशबू में कर्म सफल है।
पथरीली राह पे चलने से,
सीखा क्या गिरना होता है।
पर संग-साथ में चलने से,
जीवन मधुर बना होता है।
मैंने पगडंडी नहीं बनाई,
राह पुरानी सँवारी है।
जहाँ कदम कई ठहरे थे,
वहीं मेरी तैयारी है।
हर कोई अपनी मंज़िल ढूँढे,
पर राहें कुछ साझा हों तो।
थोड़ी थकान अगर बाँटें,
कुछ बोझे हल्के हो लें तो।
संग-साथ चलने में जो सुख,
वो एकाकी में कहाँ मिला।
संगम की उस मधुर लहर में,
हर दर्द भी हँसकर खिला।
मंज़िल चाहे अपनी हो या,
संग चलने की ख़ुशी बड़ी।
जो साथ चले, वो राह बने,
वो ही सबसे सुंदर घड़ी।
चलो किसी की थाम हथेली,
बन जाए मुस्कान का पल।
सफ़र अकेले जीत लिया तो,
क्या पाया जीवन में वह फल?
सुनील बनारसी