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1 Dec 2025 · 1 min read

कविता: 'पीड़ा'

कविता: ‘पीड़ा’

पीड़ा का गान करना तो व्यर्थ होता है,

सुख के बिना जीवन कहाँ सार्थ होता है।

जो सबमें राग रखता, वो बंध जाता है,

विरक्ति में ही सच्चा अनुराग पाता है।

गुणवान में कमियाँ नहीं, क्षमा ही पहचान है,

दाग लगे चाँद पर तो वह होता अपमान है।

वैरागी में मौन रहे, मान का न लोभ,

तभी उसका वैराग्य है अमोल और शोभ।

जो वचन में मधुरता रखे, पर सत्य न छोड़े,

वही इंसान जीवन में सच्ची मित्रता जोड़े।

जो अपमान में भी धैर्य का साथ निभाए,

अंत में विजय का मुकुट वही व्यक्ति पाए।

जहाँ सेवा में स्वार्थ की गंध न दिखे तनिक,

वही समाज बनता है सुदृढ़, पवित्र और नैतिक।

सुनील बनारसी

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