"कविता की व्यथा "
एक स्वप्न में
“कविता” से
मेरी मुलाक़ात
हो गयी
वो उदास थी, मौन थी
थकी हुई,
शिथिलता में खड़ी थी
फटी चादर
मैं लिपटी हुई
क्षीणकाय अवस्था में
आँखों से टप-टप आँसू
की धारा अविरल
छलक रही थी !
मैंने झुककर उन्हें प्रणाम किया
और इस अवस्था का
सज्ञान लिया !
कविता की आवाजों में
कंपन थी
अपने दग्ध कंठ से कहने लगी –
“मेरी किसे है सुध ?
लिखना तो सब चाहते हैं
पर जब कोई
शृंगाररहित,अशुद्ध,
नकारात्मक और
निष्कर्षरहित परिधानों
से अलंकृत मुझे करता है
तो मुझे मेरे अंगों में पक्षाघात
का एहसास होने लगता है
और तो और
कोई यदि उनकी गलतियों
को इंगित करता है
तो सुधारने के बजाय
“टेक्निकल एरर” का नाम लेते हैं
अपनी गलतियों को नज़रअंदाज़ करते हैं
लेखनी हो या कविता
तभी निखरती है
जब सत्यम ,शिवम और सुंदरम
के मंत्रों से बनती है !”
पता नहीं इतना कहते कविता
विलीन हो गई
सपने मेरे टूट गए
पर कविता अपनी बातें कहती
चली गयी !
================
डॉ लक्ष्मण झा परिमल