'आतंकवादियों का महिमा मंडन' (आलेख)
‘आतंकवादियों का महिमा मंडन’ (आलेख)
सामाजिक बुराइयों में एक भयावह बुराई है आतंकवाद । आतंकवाद का अर्थ है ऐसी क्रिया जो किसी मनुष्य द्वारा समाज में दहशत फैलाती है। ऐसे लोग देश में अपना प्रभुत्व चाहते हैं। उनके अपने नियम कानून होते हैं। वे लागू नियम कानून नहीं मानते। अपनी बात सर्वोपरि रखने के लिए वे हत्या, आगजनी, तोडफ़ोड़ एवं बंम विस्फोट करते हैं। पुलिस पर आक्रमण करते हैं।सैनिकों को धोखे से मारते हैं।
ऐसा क्यों होता है क्योंकि किसी न किसी बड़ी हस्तियों का हाथ इनके सर पर रहता है। तभी ये सुरक्षित रहते हैं और अवैध हथियार और विस्फोटक सामग्री आदानप्रदान करते रहते हैं। दुनिया में सभी देश इनसे कम या ज्यादा रूप से त्रस्त ही हैं। इसमें हमारा देश भी सदैव ही इनके निशाने पर रहता है। ये हृदय से कठोर, स्वार्थी और निर्मम होते हैं। निर्दोषों की जान लेने में इनको जरा भी मलाल नहीं होता।
इनके मारे जाने या पकड़े जाने पर इनकी सम्पत्ति कुर्क करने पर हमारे समाज के ही कुछ लोग विरोध करते हैं। इन्हें मासूम ,मजबूर, बेरोजगार , बेवा असहाय और शहीद तक कहते हैं। इनके लिए भद्र शब्द का प्रयोग करते हैं। आन्दोलन करते हैं आँसू बहाते हैं । देश के चुने हुए प्रतिनिधि को अभद्रता से बुलाया जाता है पर ऐसों को बड़े सम्मान से पुकारा जाता है। ऐसा इसलिए कि परोक्ष रूप में ये उनके काम आते हैं। जनता के साथ क्या हो रहा है उससे इनके आकाओं को कोई लेना देना नहीं। आखिर इंसान इतना क्यों गिर गया है कि अत्याचारियों के कुकर्मों पर एक शब्द नहीं बोलता।उल्टा उन्हें महिमा मंडित करना चाहता है। क्या कुछ लोग आतंकवादियों के हाथों की कठपुतली बन गये हैं। देश ऐसे लोंगों के लिए कोई महत्व नहीं रखता। धिक्कार है ऐसे व्यक्तियों पर , देश के दाना – पानी से पलकर उसी से गद्दारी करते हैं
आतंकवादी का कोई धर्म ईमान नहीं होता वो सिर्फ़ हैवान है इसलिए उसके साथ हैवानियत का ही व्यवहार उचित है।
कहा भी गया है-
“सठे च साठ्यम् समाचरेत”
लेखिका-
गोदाम्बरी नेगी ‘पुण्डरीक’