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30 Nov 2025 · 1 min read

कविता: “प्रजा-पीड़ा”

कविता: “प्रजा-पीड़ा”
रचयिता- सुनील बनारसी

गांधी के सपनों को तोड़ा,
अहिंसा का संदेश है छोड़ा।
लोकतंत्र अब शेष न बाकी,
सत्ता ने संकल्प ही तोड़ा।

धर्म बना अब राजनीति का,
नव प्रयोगशाला देखो।
संविधान की छाँव में बैठी,
न्याय की अब ज्वाला देखो।

जाति-पांति की बिसातों पर,
हर निर्णय को तौला जाता,
जनता भूखी, नेता मोटे,
और विकास बस बोला जाता।

धर्मनिरपेक्ष बचे हैं भाषण,
धरातल पर आग लगी है।
सेवा की आड़ में सत्ता ने,
तानाशाही थाम रखी है।

नैतिकता की नीति गई है,
अब तो केवल स्वार्थमूल,
विनय, दया, सत्य सभी कुछ,
राजनीति में हुए प्रतिकूल।

जनता देखे मौन तमाशा,
नेता बाँटें स्वार्थ का गान।
न्याय रुका है कागज़ में ही,
बिकता हर दिन नया विधान।

अब तो केवल लिपि बची है,
सार कहीं खोया सा है।
देश चले नारों के दम पर,
न्याय खड़ा रोया सा है।

मूल्य गिरे, विचार हुए कम,
अब आदर्श भी डरते हैं,
कुर्सी की इस यात्रा में,
सब रिश्ते भी मरते हैं।

हे भारत के युवा सपूतो!
अब जागो, कुछ काम करो,
न्यायधर्म के दीप जलाकर,
फिर नव भारत नाम करो।

देख तमाशा सत्ता का ये,
हँस के बोले मन अभिलाषी
“जैसी देखी वैसी कह दी,
क्या करूँ मैं? एक बनारसी!”

सुनील बनारसी🙏🙏🙏

(Copyright Notice): सुनील बनारसी – 2025,
यह कविता “प्रजा-पीड़ा” लेखक की मौलिक रचना है। इसके किसी भी अंश का पुनः प्रकाशन, प्रचार या उपयोग बिना अनुमति वर्जित है।

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