सोचिए जब सूचना का कोई माध्यम नहीं था। अखबार भी सभी जगह उपलब्
सोचिए जब सूचना का कोई माध्यम नहीं था। अखबार भी सभी जगह उपलब्ध नहीं था, तब मनुष्यका जीवन कैसा रहा होगा! बस अपने गाँव और आस पड़ोस की खबरें भी घर-घर जाकर लेनी पड़ती थी।
जब रेडियो का आविष्कार हुआ तो लोगों की जिंदगी ही बदल गई। आरंभ में अमीर लोग ही रेडियो खरीद पाते थे। सबको तो चलाना भी नहीं आता था। गाँव में मुखिया के घर ही रेडियो होता था। सब का काम उसी से चलता था। मुखिया जी भी शान से मूंछ ऐंठते थे। शाम के समय मुखिया जी के यहाँ बुजुर्गों की सभा जुट जाती थी। विविध भारती पर समाचार सुनने के लिये।
प्रधान जी का कुछ खेत हमारे घर के बराबर में था तो वो कभी – कभी खेत देखने उधर आ जाते थे। साथ में रेडियो भी लटका कर ले आते थे ; क्योंकि दादा जी ने कहा होता था जगतु जब इधर आओ तो रेडियो लेकर आया करो। वो गाँव का प्रधान था पर आपस में रिश्ते दारी थी तो वह दादा जी को ताऊ जी कहता था। भारत और पाकिस्तान का युद्ध चल रहा था। पिताजी भी गढ़वाल रायफल से उस युद्ध में थे। गाँव के और युवक भी थे। इस लिये हमारे घर के आंगन में गाँव के लोग रेडियो पर समाचार सुना करते थे। गाँव के बच्चे भी कौतूहल वश वहाँ खड़े हो जाते थे। सब बात करते रहते थे। भारत की सेना ने पाकिस्तान की सेना को पीछे धकेल दिया। टेंक से हमला कर दिया आदि – आदि इसी पर बातचीत होती थी। हम सब बच्चों को कुछ समझ में नहीं आता था।
धीरे धीरे मेरी रुचि भी रेडियो में होने लगी थी पर कौन इतने रुपये खर्च करते। इसलिये मैं कुछ नहीं बोली।
कुछ समय बाद दीदी का विवाह तय हो गया और जीजा जी को उपहार में रेडियो दे दिया गया। क्यों कि उनको क्रिकेट का शौक था और उन्हें रेडियो पर कमेंट्री सुनने के लिये रेडियो की इच्छा थी, जो हमें उनके मित्रों से पता चला था। मुझे भी बड़ी खुशी हुई कि जब दी के घर जाऊँगी तो रेडियो सुनने को मिल ही जायेगा।
कुछ समय पश्चात् हम भी उसी गाँव जा बसे l बस मेरी तो जैसे मनोकामना ही पूरी हो गई थी l दीदी की ननद भी मेरी सहपाठी निकली l तब मैं कक्षा 6 में थी l बस स्कूल से आते ही दीदी के घर पहुँच जाती और रेडियो बजाना शुरू कर देती l उन लोगों को भी कोई आपत्ति नहीं होती थी l तब से मुझे भजन, फिल्मी गाने याद होने लगे थे l
सौभाग्य से मेरी ससुराल में भी पहले से ही एक पुराने जमाने का टीवी के आकार का रेडियो था l जो शो पीस के अलावा कुछ नहीं था। उसे कोई बजाता नहीं था। बस मैंने उसे साफ किया और बजाने लायक किया। कुछ ही स्टेशन काम करते थे एक दो हिन्दी गानों के स्टेशन मिल गये थे। बस मैं उठकर सबसे पहले रेडियो चलाती सुबह भजन सुनती और काम भी करती रहती थी ।
फिर टीवी का जमाना आया । दूरदर्शन तक तो ठीक रहा पर केबल और कलर टीवी ने रेडियो संस्कृति को काफी हानि पहुँचाई। मेरा रेडियो सुनना भी कम हो गया। ऐसा नहीं कि मेरी रेडियो में रुचि नहीं थी पर एक ही घर में एक साथ टीवी और रेडियो कैसे चलता। इसलिए मैं जब अकेली घर में होती थी तभी रेडियो चलाती थी।
रेडियो में एक फायदा था कि व्यक्ति को अपना काम करने में रुकावट नहीं होती थी ,दोनों काम साथ-साथ होते रहते थे। साथ भी ले जा सकते थे। पर समय को कौन रोक सकता है, समय के साथ हर चीज बदल जाती है। मोबाइल क्रांति ने सबकुछ बदल दिया। आजकल सब कुछ मोबाइल पर मिल जाता है तो रेडियो का क्या काम । मेरे पास अभी भी रेडियो है पर स्टोर में रखा है बेचारा। क्या करें ? लेकिन समृति से नहीं उतर सकता लंबी उम्र का साथी जो है ।
गोदाम्बरी नेगी ‘पुण्डरीक’
हरिद्वार उत्तराखंड