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30 Nov 2025 · 1 min read

जाता हुआ नवम्बर

जैसे कोई आख़िरी चिट्ठी बिना पढ़े रखी रह जाए,
और हम सोचते रहें—
इसमें क्या लिखा होगा?

मौसम बदलता है
तो पता चलता है
कि सिर्फ़ हवा ठंडी नहीं होती,
कुछ रिश्ते भी ठंडे पड़ने लगते हैं।

साल बदल रहा है—
कैलेंडर में नहीं,
हमारी आदतों में,
हमारी चुपियों में,
उन सवालों में जिनके जवाब
कभी मिल ही नहीं पाते।

लोग बदलते हैं,
और हम सोचते रहते हैं
कि शायद अगली बार वे वहीं मिलेंगे
जहाँ हमने छोड़ा था—
पर कोई भी वहीं नहीं मिलता।

वक़्त बदलता है
तो हम समझते हैं
कि कहानियाँ बस लिखी नहीं जातीं,
वे मिटती भी रहती हैं
जैसे किसी पुराने फोटो में
चेहरे धीरे-धीरे धुँधले हो जाते हैं।

ज़िंदगी…
वह चलती तो है,
पर हर मोड़ पर थोड़ी टूटती भी है।
किसी से प्यार करते-करते
हम खुद को खो भी देते हैं,
और पाते भी हैं।

जाता हुआ नवम्बर
सिर्फ़ मौसम नहीं,
वह एक नोट है—
जो कहता है:
चलो आगे,
जहाँ जो भी बदलेगा
वही सच होगा।

महेंद्र ‘मजबूर’©️®️

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