धर्म और विज्ञान
‘धर्म’ और ‘विज्ञान’
‘धर्म’ और ‘विज्ञान’ दोनों विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। देश, समाज और व्यक्ति का विकास इन दोनों से जुड़ा हुआ है। ये एक दूसरे के पूरक हैं।
किंतु फिर भी इस पर मत भेद देखने को मिलता है। दोनों को अलग माना जाता है। न धर्म पूर्ण रूप से विज्ञान को स्वीकार नहीं करता, वहीं विज्ञान में भी धर्म के लिए कोई स्थान नहीं है।
इनका स्वरूप और मार्ग भिन्न होते हुए भी लक्ष्य एक ही है ; उन्नति और विकास।
धर्म का शाब्दिक अर्थ : धर्म एक संस्कृत शब्द है। जिसका अर्थ है धारण करने वाला। जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है।
अंग्रेजी में रिलीजन और उर्दू में मजहब के नाम से इसका अर्थ लगाया जाता है, किन्तु वास्तव में ये दोनों धर्म हैं ही नहीं। रिलीजन आस्था व विश्वास को और मजहब संप्रदाय को इंगित करता है। धर्म विस्तृत है व्यापक है इसको नियम और भाव में नहीं बाँधा जा सकता।
विज्ञान का अर्थ-
विज्ञान शब्द वि + ज्ञान से बना है, जिसका आशय विशिष्ट ज्ञान से है। वास्तव में, प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन करना तथा उनमें आपस में सम्बन्ध ज्ञात करना ही विज्ञान कहलाता है।
आइए धर्म और विज्ञान की परिभाषा पर दृष्टि डालते हैं-
धर्म को परिभाषित करना बहुत कठिन है। दुनिया के तमाम विचारकों ने इसकी अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं। इस नजरिए से वैदिक ऋषियों द्वारा दी गई परिभाषा सबसे ज्यादा उपयुक्त है- कि सृष्टि और स्वयं के हित और विकास में किए जाने वाले सभी कर्म धर्म हैं। विज्ञान भी तब धर्म है जब उसमें सर्वहित समाहित हो।
विज्ञान की परिभाषा-
प्राकृतिक घटनाओं का सुव्यवस्थित एवं क्रमबद्ध तरीके से अध्ययन करना तथा इससे प्राप्त ज्ञान को विज्ञान कहते हैं।
धर्म और विज्ञान-
धर्म और विज्ञान दोनों ही सत्य को स्वीकार करते हैं।
दोनों व्यक्ति और समाज को उन्नति की ओर ले जाते हैं। मुख्य लक्ष्य एक ही है। लक्ष्य पाने के साधन भिन्न हो सकते हैं।
वीर का धर्म युद्ध करना है लेकिन ऐसा युद्ध जो अपनी और अन्य की रक्षा के लिए हो किसी का अकारण विनाश करने या स्वार्थ के लिए नहीं।
जियो और जीने दो की नीति अपनाना धर्म है। निर्माण धर्म है विध्वंस अधर्म।
किंतु विज्ञान सिर्फ सत्य प्रमाणित करता है अच्छाई बुराई देखकर या धर्म अधर्म देखकर कार्य नहीं करता।
चीन ने कोरोना वाइरस के सत्य का पता लगाया विज्ञान के द्वारा उसकी शक्ति को परखा। उसकी खोज सिर्फ दूसरों के अहित को ध्यान में रखकर की जो अधर्म है। अगर वो धर्म को मानते समझते तो ये काम कभी नहीं करते।
विज्ञान ने अपना कार्य किया। उसे जिस लिए खोजा था उसने अपना काम किया।
अगर विज्ञान का उपयोग मानव व सृष्टि के हित में हो धर्म की दृष्टि से उसे अपनाया जाय तब वह सिर्फ कल्याणकारी होगा।
इस दृष्टि से धर्म विज्ञान से कहीं बढ़कर है क्योंकि इसमें किसीका अहित नहीं होता।
सर्वे भवंतु सुखिन सर्वे संतु निरामयाः यही धर्म का सार है यही मर्म है। धर्म में विश्व बंधुत्व का भाव है जबकि विज्ञान में निर्माण और विध्वंस दोनों छुपे हैं।
-गोदाम्बरी नेगी