"उल्फ़त"-ग़ज़ल
अदू बन गया क्यूं, दहर धीरे -धीरे,
पिलाया जो उसने, ज़हर धीरे -धीरे।
झुकी वो निगाहें, मिरी जां न ले लें,
उठेगी जो उनकी, नज़र धीरे -धीरेl
पढ़ा था कहीं, सब्र होता है मीठा,
करेंगे वो मेरी, क़दर, धीरे -धीरे।
ग़मे-शाम से, क्यूं है, घबरा गया तू,
जो आनी है लाज़िम, सहर धीरे -धीरे।
संगो-ख़ार ही, तेरी क़िस्मत नहीं है,
जो गुज़रेगी ये भी, डगर धीरे -धीरे।
समा ले जो आशिक़ का दिल, कैसे मुमकिन,
बहर में है उठती, भंवर धीरे-धीरे।
मुहब्बत का होता है, जादू निराला,
समझ पर है पाता, बशर धीरे-धीरे।
चमन का तो अब, बाल भी ना हो बांका,
जो गुल हैं, बनेंगे समर धीरे -धीरे।
बताऊंगा कैसे, मैं हर बात, उनको,
खुलेंगे जो मेरे, अधर धीरे -धीरे।
तग़ाफ़ुल भी अब तो, जगाता है आशा,
कि करती है, उल्फ़त, असर, धीरे -धीरे..!
अदू # दुश्मन, foe
दहर # संसार, world
लाज़िम # अनिवार्य, compulsory
सहर # सुबह, morning
संगो-ख़ार # पत्थर और कांटे, stones and thorns
बहर # समन्दर, sea
बशर # व्यक्ति, person
गुल # फूल, flowers
समर # फल, fruits
तग़ाफ़ुल # नज़रंदाज़ करना, to neglect
उल्फ़त # प्रेम , love
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