ग़ज़ल 1222 1222 122
ग़ज़ल 1222 1222 122
तेरे पायल की रंगत ने बिगाड़ा,
कभी तो नाक की नथ ने बिगाड़ा।
मिली तेरी मुहब्बत में खमोशी ,
मुझे तन्हा तेरी छत ने बिगाड़ा।
सदा सम्मान की चाहत गलत है
तुम्हें सम्मान की लत ने बिगाड़ा।
चराग़ों से वफ़ा जो रखते उनको,
हवाओं की शरारत ने बिगाड़ा।
हुए बर्बाद हम नेतागिरी में,
वतन को बस सियासत ने बिगाड़ा।
विदेशी चीज़ें की ख्वाहिश रखो मत,
हमें बाज़ारू संगत ने बिगाड़ा।
समय की मार से बचना कठिन,
हमें इतनी सी मोहलत ने बिगाड़ा।
( डॉ संजय दानी दुर्ग सर्वाधिकार सुरक्षित )