आजादी की वर्षगांठ
आज
फिर कैलेंडर की दीवार पर
लाल गोला बनाकर
लिख दिया गया है आजादी।
गली के मोड़ पर
झंडे बेचने वाला लड़का
अब भी अपनी फटी जेब में
किसी गणतंत्र के सिक्के टटोल रहा है,
और उसकी आँखों में
इतिहास की कोई रोशनी नहीं
सिर्फ़ धूप की किरकिराहट है।
उधर, नेता
अपने भाषण में
राष्ट्र को नया बताते–बताते
इतना पुराना हो चुका है
कि शब्द भी थककर
उसकी कुर्सी पर जम्हाई लेने लगते हैं।
सच कहूँ
आजादी की यह वर्षगांठ
कुछ ऐसी लगती है
जैसे किसी खिड़की पर
पुराना ताला लटक रहा हो
और लोग ताली बजाकर सोच रहे हों
कि दरवाज़ा खुल चुका है।
भीड़ में
एक बूढ़ा आदमी कहता है
बेटा, आजादी तब आती है
जब पेट में भूख कम
और दिमाग में डर कम हो।
पर उसकी आवाज़
लाउडस्पीकर की देशभक्ति में
कहीं दब जाती है।
मैं सोचता हूँ
क्या सचमुच हमने आजादी पाई है?
या यह बस
हर साल लौट आने वाली
एक रस्म है,
जिसे निभाने के बाद
हम फिर वही
धुएँ भरा आसमान
और टूटे सपनों वाली सड़कें
घर ले आते हैं?
आज
जब झंडे हवा में फड़फड़ा रहे हैं,
मेरे भीतर
एक चुप्पी खड़ी है
जो पूछती है
कब मनाया जाएगा
सचमुच का स्वतंत्रता दिवस?
और मैं
अपनी जेब में हाथ डालकर
सिर्फ़ उँगलियों की गर्माहट पाता हूँ
क्योंकि देश
अब भी कहीं बाहर नहीं,
अंदर ही सुलग रहा है।
© अमन कुमार होली