मुक्तक
बेक़रारी की दिल पर कटार गुज़री है।
कौन सी बात तुम्हें नागवार गुज़री है।
आज आए नहीं ख़्वाब में भी क्यों तुम ,
सोचते- सोचते चाँद रात गुज़री है।।
डॉक्टर रागिनी स्वर्णकार
बेक़रारी की दिल पर कटार गुज़री है।
कौन सी बात तुम्हें नागवार गुज़री है।
आज आए नहीं ख़्वाब में भी क्यों तुम ,
सोचते- सोचते चाँद रात गुज़री है।।
डॉक्टर रागिनी स्वर्णकार