हो जाओ सब एक
यदि निशाचरी सोच का, होगा शीघ्र न अंत।
नहीं बचेगा भूमि पर, कोई साधू संत।।
मानव दानव की तरह,करता है व्यवहार।
भूल गया निज आचरण,जीवन का आधार।।
रहना खाना हो गया, एकदम पशु समान।
मार रहे इंसान को,बन करके शैतान।।
जातिवाद के फेर में, लड़े मनुज हर रोज।
सत्य सनातन छोड़कर, रहे धर्म नव खोज।।
जाति धर्म निज त्यागकर,बदल रहे भगवान।
मनुज धर्म से हो विमुख,भूले निज पहचान।।
आजादी के नाम पर, करते अत्याचार।
देश विरोधी बात कर, रहे दहाड़े मार।।
अपने से कमजोर का,छीन रहे अधिकार।
हैवानों सा दीन से, करते हैं व्यवहार।।
सड़क किनारे बैठ कर, करते नित हड़ताल।
जाति धर्म के नाम पर, करते रोज बवाल।।
दंगे फैला देश में,माल रहे हैं काट।
जातिवाद विष घोलकर, रहे मलाई चाट।।
भोली जनता को फँसा, करते भीतर घात।
बनते साहूकार हैं,पर हैं उल्टी आँत।।
अधिकारों के नाम पर, तोड़ रहे कानून।
देशीय संविधान का, करते हैं नित खून।।
सोने की चिड़िया कभी,था ये भारत देश।
जातीय राजनीति ने,बदल दिया परिवेश।।
खत्म एकता हो गई, नहीं रहोगे नेक।
सुरक्षित रहना है अगर,हो जाओ सब एक।।
खा जाएगी एक दिन, हमें हमारी फूट।
दुश्मन बैठा ताक में,घर जाएगा लूट।।
स्वरचित रचना-राम जी तिवारी”राम”
उन्नाव (उत्तर प्रदेश)