कविता: “अंधकार के उस पार”
“अंधकार के उस पार”
सुनील बनारसी
सूरज पे कालिख टिकती कब,
प्रभा नहीं मिट पाती है।
रात घनी हो चाहे जितनी,
भोर स्वयं आ जाती है।
दौर हमारा संघर्ष भले हो,
पर हार नहीं, बस सीखाई।
जो रुसवाई तुमने गिनवाई,
वही राह नई दिखलाई।
आदर्श अगर छोटे दिखते,
तो भी दीप जलाते हैं।
गुमराह हुए कुछ लोग सही,
कुछ सच्चे राह बनाते हैं।
अंधे नहीं, दृष्टि हैं भीतर,
बस पहचान जरूरी भाई।
दौर हमारा गढ़ ही रहा है
नई सदी की गहराई।
झूठ अगर उत्सव मनाता है,
सच चुपचाप सँवरता है।
राख भले ही ढँक ले उसको,
अंगार पुनः दहकता है।
सेज नहीं, काँटों पर चलकर,
मानव ने जीत है पाई।
दौर हमारा बना रहा है
सच्चाई की प्रभुताई।
छल चाहे फैले संबंधों में,
विश्वास पुनः अंकुर होगा।
मर्यादा की जड़ें गहरी हैं,
संकट में भी अमर होगा।
हल्के नहीं, इंसान ही तो
भारी करता हर परछाई।
दौर हमारा सँजो रहा है
उज्ज्वलतम भव-सुधाई।
शब्द नहीं बस आक्रोश यहाँ,
वो बीज विचार जगाते हैं।
मुद्दे खोते नहीं, कभी वो
समय संग हल हो जाते हैं।
नियंता भटके हों तो भी,
जन-जागृति राह दिखलाई।
दौर हमारा झेल नहीं,
बस गढ़ता नयी तरुनाई।
सुनील बनारसी