शीर्षक: समय ने सिखाया मुझे धीरे-धीरे
शीर्षक: समय ने सिखाया मुझे धीरे-धीरे
बुना है ये जीवन का घर धीरे-धीरे,
सँवरे हैं सपनों के स्वर धीरे-धीरे।
न कोई दिखावा, न ऊँची उड़ानें,
बढ़े हैं कदम बिन शोर धीरे-धीरे।
कभी धूप में जल के सीखा सबक वो,
मिला छाँव का भी असर धीरे-धीरे।
जहां लोग भागे थे नामों के पीछे,
मैं ढूँढता रहा खुद का दर धीरे-धीरे।
गिरा जब तो जाना उठाने की आदत,
सँवरा मेरा ये सफ़र धीरे-धीरे।
कभी आँसुओं से लिखा गीत मैंने,
बनी उसकी मीठी लहर धीरे-धीरे।
न थी कोई दौलत, न सोने की मूरत,
मिली मुझको रूह की नज़र धीरे-धीरे।
मिला क्या मुझे इस जहाँ की हलचल,
बनारसी बन गया ये असर धीरे-धीरे।
सुनील बनारसी
7479468737