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29 Nov 2025 · 1 min read

शीर्षक: समय ने सिखाया मुझे धीरे-धीरे

शीर्षक: समय ने सिखाया मुझे धीरे-धीरे

बुना है ये जीवन का घर धीरे-धीरे,
सँवरे हैं सपनों के स्वर धीरे-धीरे।

न कोई दिखावा, न ऊँची उड़ानें,
बढ़े हैं कदम बिन शोर धीरे-धीरे।

कभी धूप में जल के सीखा सबक वो,
मिला छाँव का भी असर धीरे-धीरे।

जहां लोग भागे थे नामों के पीछे,
मैं ढूँढता रहा खुद का दर धीरे-धीरे।

गिरा जब तो जाना उठाने की आदत,
सँवरा मेरा ये सफ़र धीरे-धीरे।

कभी आँसुओं से लिखा गीत मैंने,
बनी उसकी मीठी लहर धीरे-धीरे।

न थी कोई दौलत, न सोने की मूरत,
मिली मुझको रूह की नज़र धीरे-धीरे।

मिला क्या मुझे इस जहाँ की हलचल,
बनारसी बन गया ये असर धीरे-धीरे।

सुनील बनारसी
7479468737

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