मजबूरी का तख्त
हमें कभी मुकद्दस निगाहों से देखा ही नहीं गया,
हमारे भीतर की रोशनी को समझा ही नहीं गया।
हमने दिलों में महल बनाए, उम्मीदें सजाईं,
पर ज़माने ने हमें पैरों की ख़ाक समझा।
हम राजा थे अपने सपनों के, अपनी रूह के,
मगर हालातों ने हमें मजबूर सा लिख दिया।
किस्मत की लकीरों में ताक़त थी बहुत,
पर हाथों में ज़ंजीरों का वक़्त थमा रहा।
हम मुस्कुराए भी तो दर्द की कीमत देकर,
हम चले भी तो रेत पर काँटे रखकर।
शान छुपाकर भी सीना तान कर चलते रहे,
क्योंकि हक़ था हमारा—भले दुनिया ने न दिया।
हम मजदूर भी थे, हम ही शहंशाह भी,
बस अंतर इतना था—दुनिया ने हमें जाना नहीं।
हमारे भीतर जो आग थी, उसने हमेशा कहा—
राजा होना ताज पहनना नहीं, गिरकर भी खड़ा रहना है।
महेंद्र ‘मजबूर’