सभ्यता का पालतू जानवर
सभ्यता का पालतू जानवर
तुम्हें गलतफहमी है
कि वह कानून की पकड़ से बाहर है।
सच तो यह है
कि वह कानून की जेब के अंदर है
गर्माहट पा रहा है।
मैंने कचहरी के गलियारों में
न्याय को उबासियाँ लेते देखा है,
जहाँ गवाहों की जुबान पर
सिक्कों का ताला है,
और तारीख वह लोरी है
जिसे गाकर
फाइलों को सुला दिया जाता है।
जिसे तुम अपराध कहते हो,
वह अब कैरियर है।
देखो!
सड़क पर खून बहाने वाला हाथ
अगले ही दिन
किसी बड़े साहब के गले में
फूलों का हार पहना रहा है।
यह व्यवस्था का चमत्कार है
कि यहाँ कातिल को
सुधरने का मौका मिलता है,
और पीड़ित को
सिर्फ सब्र करने की सलाह।
उनका पृष्ठ-पोषण
दूध और बादाम से नहीं होता,
उनका पोषण होता है
थानेदार की उस मद्धम मुस्कान से,
जो रपट लिखते वक्त
कलम की नोक तोड़ देता है।
वे इस जनतंत्र के
बिगड़े हुए, मगर लाडले बच्चे हैं।
जिन्हें पता है कि घर (संसद) का मालिक
चाहे कितना भी डांटे,
आखिर में वसीयत
उन्हीं के नाम होगी।
और हम?
हम वो दर्शक हैं
जो सर्कस खत्म होने के बाद भी
खाली कुर्सियों को घूरते हुए
सोचते हैं कि शेर पिंजरे में क्यों नहीं गया?