कामगार का घोषणा-पत्र
अरे ओ! सँभलकर! यह कोई
प्रेम कविता नहीं है
जो शहद में लथपथ हो
और तुम्हारी फटी कमीज़
या हाथों के गट्टे देखकर
आँसू बहाए।
यह कविता है
उस आदमी की जो
आँखों में गूँथकर धूल
हर सुबह अपनी देह को
रोटी की कीमत में
चढ़ाने जाता है।
तुम उसे ‘श्रमजीवी’ कहते हो,
हम उसे अधमरा कहते हैं।
हाँ, वही, जो
अपने पसीने को मज़दूरी
और फटे हाल को क़िस्मत मानकर
जी रहा है।
बाबूजी!
यह सड़क जिसे तुम
प्रगति का हाईवे कहते हो
यह बनी है उसी के
मारे हुए समय और
टूटी हुई हड्डियों के गारे से।
उसका आक्रोशित स्वर
यह कोई छंद नहीं है मेरे दोस्त!
यह उसके भीतर का जंग है
जो हर शाम, घर लौटते हुए
बीवी की भूखी आँखें
और बच्चों की खुशक़ मुस्कान देखकर
और भभक उठता है।
साफ़ सुनो!
वह जो तुम्हें
ईंट ढोता,
सब्ज़ी बेचता,
या गटर साफ़ करता दिखता है,
वह कोई वोट बैंक नहीं है
कोई सरकारी आँकड़ा नहीं है।
वह सिर्फ़ एक आदमी है
जो अपनी भूख को
अपने हिस्से की
सबसे बड़ी सजा मानकर
जी रहा है
और जिसके माथे पर
एक अदना पसीना
चिपका है
जो कभी-कभी
तुम्हारे तिरस्कार भी
पुरस्कार मानकर रख लेता है।
© अमन कुमार होली