कविता: 'बेरोज़गार की दास्तान'
‘बेरोज़गार की दास्तान’
लेखक :सुनील बनारसी
प्रस्तावना,
आज के समय में “रोज़गार” केवल एक ज़रूरत नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। शिक्षा, परिश्रम और सपनों के बावजूद जब किसी युवा के हाथ में काम नहीं होता, तो उसकी आँखों की चमक धीरे-धीरे बुझने लगती है। खेतों से लेकर शहरों तक, दफ्तरों से लेकर सड़कों तक, हर जगह कोई न कोई बेरोज़गार अपनी किस्मत से जूझता नज़र आता है — कभी उम्मीदों के सहारे, कभी हताशा के किनारे।
इसी संवेदनशील यथार्थ को कवि सुनील बनारसी ने अपनी कविता “बेरोज़गार की दास्तान” में बड़ी मार्मिकता से व्यक्त किया है। यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की करुण पुकार है जो सपनों के उजाले में पली और सिस्टम की अंधेरों में खो गई। इसमें एक ऐसे युवक की कहानी छिपी है जो खेत से दफ्तर तक पहुँचा, लेकिन उसकी मेहनत और शिक्षा बाज़ार के तराजू में औकात ढूँढती रह गई।
यह रचना आधुनिक भारतीय समाज के उस मौन संघर्ष का प्रतीक है, जहाँ “डिग्री है पर नौकरी नहीं, उम्मीद है पर ठिकाना नहीं।” कविता अपने शब्दों से न केवल व्यथा को उजागर करती है, बल्कि भीतर एक आग भी जगाती है — उस परिवर्तन की जो इंसान को उसकी खोई हुई पहचान लौटा सके।
यह दास्तान हर उस दिल की आवाज़ है जो आज भी कहता है —
“हम ज़िंदा हैं जनाब, उम्मीदें चलाते हैं…”
कविता: ‘बेरोज़गार की दास्तान’
सुनिए जनाब… ये कहानी आज़ के इंसान की,
रोटी और सपनों की..,और टूटी हुई पहचान की।
वो जो कल तक खेत में हल जोतता मुस्कान से,
आज सिमटा है फ़ाइलों में ..बस एक पहचान से।
हाथ में डिग्री है,जनाब..लेकिन काम का मोल नहीं,
रात जागे रोज़ पर दिन का भी ठिकाना गोल नहीं।
माँ की चूड़ियाँ पिघल कर बन गईं अब कर्ज़ में,
बाप की आँखें बुझी हैं मौन से…… पर हर्ज़ में।
भूख जब गूंजे तो आदर्श भी थर्राने लगे,
रोटियों के भाव में सारे सबक आने लगे।
सपनों की तख्ती पे बस मिट्टी की लिखावट है,
ख्वाब टूटा हर गली में लाचारी की आहट है।
कौन जाने गाँव से निकला वो नौजवान क्या है,
भीड़ में चेहरा है या बस इक- बयान सा क्या है?
सड़क पूछे — “किधर जाओगे अब ओ बेरोज़गार?”
वो कहे —“जिस ओर जाऊँ..वहीं बिकता है बाज़ार!”
सरकारें वादों की चाशनी में बोलती हैं,
पर हक़ीक़त में वो बस आँकड़े ही खोलती हैं।
भूख से जब पेट खाली हो, तो ईमान बिकता है,
फर्ज़ मुरझाता है, बचपन का अरमान सिमटता है।
देखिए न! आज भी इंसान बिकता धूप में,
रोज़ मरता है कोई अफसर की दस्तख़त रूप में।
कह दो उन साहबों से जो भाषण सजाते हैं,
हम तो ज़िंदा हैं जनाब — उम्मीदें चलाते हैं…
अब आँसू नहीं बचेंगे… बस धुआँ ही उठेगा,
जिस्म ही नहीं जनाब….. सपना भी जलेगा।
सुनिए बनारसी…ये कहानी आज़ के इंसान की,
रोटी और सपनों की,…… टूटी हुई पहचान की।
सुनील बनारसी
✍️ लेखक की कलम से
आज के इस दौर में जब शिक्षित युवा भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, तब “बेरोज़गार की दास्तान” जैसी कविता लिखना केवल भावनाओं का विस्फोट नहीं, बल्कि एक सच्चाई को शब्द देना है। मैंने यह कविता तब लिखी जब अपने आस-पास कई ऐसे चेहरे देखे — जिनके हाथ में डिग्री थी, पर रोज़गार नहीं; जिनकी आँखों में सपने थे, पर उन सपनों की कोई मंज़िल नहीं।
हर गली, हर दफ़्तर, हर अख़बार में मुझे वही एक प्रश्न गूंजता सुनाई दिया — “मेहनत का मोल आखिर कहाँ गया?”
यही प्रश्न एक दिन मेरी कलम बन गया, और जन्म हुई इस “दास्तान” की।
यह कविता किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस पूरे समाज की आवाज़ है जो भूख, महँगाई और वादों के बोझ तले दबा हुआ है। इसमें वह माँ भी है जिसने अपने बेटे की नौकरी की आस में चूड़ियाँ गिरवी रख दीं, वह पिता भी है जिसकी आँखों का उजाला उम्मीदों के अंधेरे में खो गया।
मैंने कोशिश की है कि शब्दों के ज़रिए उन अनसुनी आहों, टूटी उम्मीदों और बिखरे सपनों को आवाज़ दूँ।
अगर यह कविता किसी एक भी पाठक के भीतर एक सवाल, एक सोच या एक चिंगारी जगा सके —
तो समझिए, “बेरोज़गार की दास्तान” अपनी मंज़िल पा गई।
– सुनील बनारसी
© सुनील बनारसी, सर्वाधिकार सुरक्षित।
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यह रचना साहित्यिक और सामाजिक उद्देश्य से लिखी गई है। इसके विचार और भाव लेखक के निजी अनुभवों तथा सामाजिक पर्यवेक्षण पर आधारित हैं।
लेखक: सुनील बनारसी
प्रकाशन वर्ष: 2025
सर्वाधिकार सुरक्षित © Sunil Banarasi, 2025