#प्रसंगवश
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■ आज प्रसाद जी होते तो..!
【प्रणय प्रभात】
हिंदी साहित्य की कालजयी कृति “कामायनी” के प्रणेता और छायावाद के महान कवि श्रद्धेय श्री “जयशंकर प्रसाद” जी ने कभी नारी सम्मान को रेखांकित करते हुए कहा था-
“नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग-पग-तल में।
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।।”
मुझे लगता है कि प्रसाद जी यदि आज होते तो मौजूदा दौर की विकृतियों पर शायद कुछ यूँ लिखते-
“नारी तुम श्रद्धा हो कर भी, क्यों फँस जाती हो दलदल में?
टुकड़ों-टुकड़ों में बँट कर के, खोजी जाती हो जंगल मे।।’
यह बात उनकी समझ मे आएगी जिनकी साहित्य व सामयिक संदर्भों पर समान पकड़ होगी। बाक़ी के लिए इस बार भी “काला अक्षर ——-!!” आशा है आपको “श्रद्धा” याद होगी। सघन जंगल में यत्र तत्र बिखरी प्लास्टिक की काली थैलियों में मिली श्रद्धा। जिसकी रूह 3 साल बाद भी न्याय के मंदिर के आसपास मंडरा रही होगी।।
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संपादक
न्यूज़&व्यूज
श्योपुर (मप्र)