दोहा सप्तक. . . . . सुख - दुख
दोहा सप्तक. . . . . सुख – दुख
सुख – दुख तो संसार में, जैसे छाया धूप ।
निश्चित सबको भोगना, निर्धन हो या भूप ।।
कर्मों का प्रतिरूप है, सुख-दुख का अस्तित्व ।
इस पर ही इंसान का, निर्भर है व्यक्तित्व ।।
सुख – दुख तो इंसान के, चलते हरदम साथ ।
जीवन भर रहते भरे , इनसे दोनों हाथ ।।
लेते हैं दुख में सदा, लोग ईश का नाम ।
सुख में लेकिन अर्थ को ,समझें अपना राम ।।
सुख – दुख की अनुभूति तो, जीवन का है सार ।
इनसे ही तो जिंदगी, करे सदा शृंगार ।।
सुख के साथी सब यहाँ, दुख में रहते दूर ।
यही चलन संसार का, और यही दस्तूर ।।
आगे- पीछे जीव के, सुख – दुख चलते साथ ।
जीवन भर कब छोड़ते , यह मानव का हाथ ।।
सुशील सरना / 28-11-25