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28 Nov 2025 · 2 min read

कविता: "माया मोह "

कविता: “माया मोह ”
लेखक: सुनील बनारसी

प्रस्तावना,

जीवन के इस अनंत प्रवाह में मनुष्य अक्सर माया और मोह के भंवर में उलझ जाता है। सुख, संपत्ति, संबंध और नाम की चाह में वह उस सत्य से दूर चला जाता है जो वास्तव में उसके भीतर ही विद्यमान है। यह कविता “माया मोह” उसी जागरण की पुकार है — जहाँ बाहरी चमक-दमक के पार जाकर आत्मा की सच्ची शांति को खोजने की प्रेरणा मिलती है।

इस रचना में मनुष्य के मोहग्रस्त जीवन की पीड़ा और उसकी मुक्ति की राह, दोनों का सूक्ष्म चित्रण हुआ है। कवि ने सरल शब्दों में यह बताया है कि जो कुछ भी इस संसार में है — धन, वैभव, संबंध — सब क्षणिक हैं; केवल कर्म और सत्य ही हमारे साथ चलते हैं। यह कविता आत्मा की आंतरिक आवाज़ को सुनने, जीवन के असली अर्थ को पहचानने और माया के बंधनों से ऊपर उठने का संदेश देती है।

“माया मोह” केवल एक कविता नहीं, बल्कि एक आत्मसंवाद है — एक ऐसे मन की गूंज जो संसार को देखता भी है और समझना भी चाहता है। इसमें जीवन का दर्शन है, वैराग्य की झलक है, और आत्मज्ञान की कोमल पुकार भी।

कविता: “माया मोह ”

माया मोह की ये कैसी छाया,
सत्य को ढक लेती पल में।
झूठे सपनों का जग रच देती,
मन उलझा देती हर छल में।

जिसको अपना मानते हो तुम,
वो भी इक दिन बिछड़ जाएगा।
फिर क्यों इतना करते जतन,
जो अंत में छूट ही जाएगा।

धन और संपत्ति का क्या रखना,
यहीं धरा रह जाएगा सब।
साथ चलेगा तो कर्म तुम्हारा,
समझो इस जीवन का मतलब।

मोह के बंधन तोड़ो अब तुम,
देखो जग की सच्चाई को।
आत्मा की आवाज़ सुनो अपनी,
पहचानो अपनेपन की गहराई को।

यह माया तो एक छलावा है,
क्षणिक सुखों का एक जाल।
सत्य तो है अविनाशी भीतर,
उसी को अपना लो तत्काल।

माया झूठी, मोह अधूरा,
सच्चा प्रेम है दुर्लभ संग।
बनारसी अब तो यही कहे,
सत्य ही जीवन का रंग।

सुनील बनारसी

लेखक की कलम से:

“माया मोह” जीवन के उस सत्य की खोज है, जो बाहरी चमक-दमक से परे आत्मा की गहराइयों में छिपा है। यह कविता उस चेतना की अभिव्यक्ति है जो मनुष्य को माया के बंधनों से मुक्त होकर अपने भीतर झाँकने की प्रेरणा देती है। संसार का हर सुख क्षणिक है, पर सत्य और कर्म ही अमर हैं — यही अनुभूति इस रचना का आधार है।

© सुनील बनारसी, 2025
सर्वाधिकार सुरक्षित।
इस कविता “माया मोह” का कोई भी अंश लेखक की अनुमति के बिना किसी रूप में पुनर्प्रकाशित, संकलित या प्रसारित नहीं किया जा सकता — चाहे वह मुद्रित, डिजिटल, ऑडियो या दृश्य माध्यम में हो।
यह रचना लेखक की मौलिक सृजनधर्मिता की प्रतीक है।

सुनील बनारसी
7479468737

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