देवी
घने केश यूं, जैसे सावन की रात,
अँधेरे में भी, ऐसी सुनहरी बात।
माथे पर झूमर, तारे सा चमके,
आँखों में अमृत, हर पल छलके।
श्वेत वस्त्र, स्वर्ण किनारी से सजे,
जैसे देवलोक के मृदु गीत बजे।
हाथों में कमल, खिला प्रेम का सार,
बरसे ईश्वर की करुणा अपार।
वर्षा की बूँदें, मोती सी गिरतीं,
देह से दिव्य आभा है निकलती।
चूड़ियाँ कंगन, रवि से दमकते,
नभ में जैसे कई मंत्र महकते।
यह नारी शक्ति, यह रूप अनूप,
हर कण में ब्रह्म का दिखता स्वरूप।
सौंदर्य, माधुर्य, पवित्रता का द्वार,
शीश झुका पूजूँ, मैं कोटि-कोटि बार।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’