जुबाँ तेरी जो वफ़ा की दुहाई देती है
जुबाँ तेरी जो वफ़ा की दुहाई देती है
आँख में तेरी जफ़ा भी दिखाई देती है
हमपे पोशीदा नहीं है हमारा मुश्तक़बिल
हमें भी वक़्त की आहट सुनाई देती है
बाग़ में कुछ दिनों की मेहमाँ थी बहारें भी
शाख़ रो रो के उन्हें भी बिदाई देती है
क़वी की ठोकरों में राय है ज़माने की
नातवां शै ही सभी को सफाई देती है