माटी के लिए
///माटी के लिए///
मैं सामान्य मानव हूं
मुझे देवता या राक्षस बनने की कोई अभिलाषा नहीं है
मैं मानव रहकर
मानव के मर्म को समझने की कोशिश करूंगा
मानव का मानव बनकर रहना
क्या कोई छोटी उपलब्धि है
मानव का समग्र रूप से मानव होना
मैं सोचता हूं
इस विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्राप्ति है।।
क्या होगा
यदि देवता बनने /बताने का यत्न करूं
मुझे आकाश मार्ग से विचरण करने का
स्वर्ग में रहने का
चंद्रमा सा प्रकाशमान होने का
कोई आकर्षण नहीं
भोग और उसकी लिप्सा मुझे नहीं खिंचती।।
मैं जीना चाहता हूं धरती पर
धरती की माटी पर
पंचतत्वों के रंग में रंगा
इसी धरती पर मेरा जीवन व्यापन हो
वैभव की लालसा क्यों कर करूं
क्या वैभव मुझे विचलित कर सकेंगे।।
जिन हाथों में अधिकार और अस्त्र शस्त्र हैं
उनकी बलशीलता और मैं निहत्था
अगर उनने शस्त्रों के बल पर
बंद भी कर दिया कारागृह में
जिसकी श्रृंग शिखरों की सी
ऊंची भीत्तियां
भीतर घना अंधकार
शुद्ध वायु रहित सड़ांध भरा परिवेश
मुझे तो सहना ही होगा यह सब
फिर भी मैं जिऊंगा अपने ढंग से
इस माटी में
इसी माटी के लिए
जिस माटी में
राम कृष्ण राणा शिवा शंकर जन्म लेते हैं
मैं इस माटी के लिए जी कर
आप्त भाव प्राप्त कर सकूंगा।।
ऊंची कारागृहों की दीवारें
क्या बांध पाएगी मुझे ?
होने दो उन्हें ऊंची से ऊंची
जितनी चाहें उतनी
होने दो उनके हाथों में
भयंकर अस्त्र-शस्त्र और प्रविधि
तो क्या वे नष्ट कर देंगे वह स्फुरणा
माटी और जीवमात्र की
नही? ऐसा होना कभी संभव नहीं
इसी तरह
आपका वह राज वैभव
क्या? बदल सकेगा मेरी प्रवृत्ति।।
हां मैं देवता नहीं होना चाहता
देवता भी मेरे मन में
नहीं जगा सकते देवता बनने की आकांक्षा
और न ही राक्षसी प्रवृत्तियां
मुझे बाध्य कर सकती हैं
राक्षस बनने के लिए
मैं मानव हूं मानव रहूंगा
और जिऊंगा इस माटी के लिए
जीव मात्र के लिए।।
स्वरचित मौलिक रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)